ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

प्रीति की रीती भली

प्रीति की रीती भली

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि |
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि ||

प्रेम की सुंदर रीति देखिये कि जल भी दूध के साथ मिलकर समान भाव में बिकता है। परंतु कपटरूपी खटाई पडते ही पानी अलग हो जाता है, दूध फट जाता है और स्वाद (प्रेम) भी चला जाता है।

श्रीरामचरितमानस

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