ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

सीता वियोग - श्री रामचरितमानस

सीता वियोग - श्री रामचरितमानस

अवगुन एक मोर मैं माना , बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ||
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा , निसरत प्रान करहिं हठी बाधा ||

(हनुमानजी ने कहा-) आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है | (जानकीजी) नेत्रों को आपके चरणों में लगाए रहती हैं, यही ताला लगा है, फिर प्राण जाएँ तो किस मार्ग से? हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकीजी ने मुझसे कुछ वचन कहे- मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ | फिर स्वामी (आप) ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया? (हाँ) एक दोष मैं अपना (अवश्य) मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गए, किंतु हे नाथ! यह तो नेत्रों का अपराध है जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं (रोक लेते हे) ||

श्रीरामचरितमानस

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