ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

संगत का असर - श्री रामचरितमानस

संगत का असर - श्री रामचरितमानस

गगन चढ़ई रज पवन प्रसंगा | कींचहि मिलइ नीच जल संगा ||
साधु असाधु सदन सुक सारी | सुमिरहिं राम देहिं गनी गारीं ||

पवन के संग से धूल आकाश में चढ़ जाती हे और वही धूल नीच (निचे बहने वाले) जलके संग से कीचड में मिल जाती हे | साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरन करते हे और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गलियां देते हे ||

-श्री रामचरितमानस

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