ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

प्रलय - श्रीमहाभारत (नीलकण्ठी टिका)

प्रलय - श्रीमहाभारत (नीलकण्ठी टिका)

यदिदं दृश्यते किंचिद भूतं स्थावरजङ्गमम |
पुनः संक्षिप्यते सर्वे जगत प्राप्ते युगक्षये || ३८ ||

यह जो कुछ भी स्थावर - जङ्गम जगत दृष्टिगोचर होता हे , यह सब प्रलयकाल आने पर अपने कारण में विलीन हो जाता हे ||

-श्रीमहाभारत (नीलकण्ठी टिका)

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