ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

अवधुत गीता

अवधुत गीता

न मानसं कर्म शुभाशुभं मे, न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे |
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे,ज्ञानामृतं शुद्धमतीन्द्रियोऽहम् ||

मन के द्वारा किये गये शुभ व अशुभ कर्म मेरे नहीं हैं, न शरीर द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्म मेरे हैं, वाणी द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्म भी मेरे नहीं हैं| मैं शुद्ध, ज्ञानामृत एवं इन्द्रियों का अविषय हूँ ||

-अवधुत गीता

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