ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

जिव और शिव में अंतर - श्रीमद्भागवतम्

जिव और शिव में अंतर - श्रीमद्भागवतम्

एक अनीह अरूप अनामा | अज सच्चिदानंद पर धामा ||
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना | तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ||

समस्त जीव सनातन रूप से मेरे अंश हैं ||

श्रीमद्भागवतम् (१०.८७.३०) में मूर्तिमान वेद भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे परम नित्य प्रभु, यदि जीवात्माएँ आपके समतुल्य होती तथा फलस्वरूप आपके समान सर्व-व्यापक और सर्वशक्तिमान होतीं, तो आपकी बहिरंगा शक्ति, माया द्वारा उनके नियंत्रित होने की कोई संभावना न होती।” अतः, जीवात्माओं को परम तत्त्व के अंश रूप में स्वीकार करना चाहिए | अंश होने के नाते वे गुण में भगवान के समान है, किन्तु वे असीमित नहीं हैं ||

श्रीमद्भागवतम्

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