ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

भगवान दत्तात्रेय परमेश्वर स्वरुप हे - अवधूतगीता

भगवान दत्तात्रेय परमेश्वर स्वरुप हे - अवधूतगीता

अहमेकमिदं सर्वं व्योमातीतंनिरन्तरम् |
पश्यामि कथमाष्मानं प्रत्यक्ष वा तिरोहितम् ||

में आत्मा को प्रत्यक्ष अथवा तिरोहित किस प्रकार देखें क्योंकि मैं (आत्मा स्वरूप होने से) एक ही तथा यही सर्वरूप हूँ तथा आकाश से भी परे निरन्तर हूँ ||

भगवान् दत्तात्रेय कहते हैं कि मैं आत्मा रूप होने से यह अनुभव कर रहा हूँ कि मैं एक ही आत्मा हूँ तथा मैं ही सब कुछ हूँ | मेरे सिवा दूसरा कोई है ही नहीं, फिर कौन किसको देखे | देखने वाला दूसरा कोई नहीं ||

अवधूतगीता

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