ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

इंसान को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए

इंसान को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए

ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थी चानुचिन्तयेत |
कायक्लेशांश्च तन्मूलान वेदतत्वार्थमेव च ||

इंसान को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए और गुणवान और धनवान बनने का चिंतन करना चाहिए | उसके लिए आवश्यक परिश्रम का विचार करना चाहिए और वेद तत्वार्थ का भी चिंतन करना चाहिए ||

मनुस्मृति ( अध्याय ४,श्लोक ९२ )

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