ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है

सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है

सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा | गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ||
अगुन अरूप अलख अज जोई | भगत प्रेम बस सगुन सो होई ||

सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है—मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते है जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा हैं, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है ||

-श्री रामचरितमानस

comments powered by Disqus