ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

मुनियोंके वर्णनके सहारे हम ईश्वर को सहज ही जान सकते है

मुनियोंके वर्णनके सहारे हम ईश्वर को सहज ही जान सकते है

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं |
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ||

जो अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियाँ हैं, यदि राजा उनपर पुल बँधा देता है तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उनपर चढ़कर बिना ही परिश्रमके पार चली जाती हैं [ इसी प्रकार मुनियोंके वर्णनके सहारे मैं भी श्रीरामचरित्रका वर्णन सहज ही कर सकेंगा ]

- श्री रामचरितमानस

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