ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

अवधूतगीता - शोक क्यों

अवधूतगीता - शोक क्यों

जन्म मृत्युनंते चित्तं बन्धमोक्षो शुभाशुभौ |
कथं रोदिषि रे वत्स नाम रूपं न ते न मे ||

जन्म और मृत्यु, बन्धन और मोक्ष तथा शुभ-अशुभ सब मन के धर्म हैं, तेरे नहीं हैं, ये नाम और रूप भी न तेरे हैं न मेरे | फिर हे वत्स! तू क्यों रूदन करता है |

- अवधूतगीता

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