ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

संत और साधारण मनुष्य में अंतर

संत और साधारण मनुष्य में अंतर

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार |
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ||

विधाताने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है। किंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं

-श्री रामचरितमानस

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