ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

हमें अपना अच्छा स्वाभाव नहीं त्यागना चाहिए

हमें अपना अच्छा स्वाभाव नहीं त्यागना चाहिए

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु | सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ||

भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचताको ही ग्रहण किये रहता है | अमृतकी सराहना अमर करनेमें होती है और विषकी मारनेमें ||

- श्री रामचरितमानस

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