ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

सब का कल्याण हो

सब का कल्याण हो

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः | सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत् ||

(इस जगत में) सभी (जीव) सुखी हो, सभी निरोगी हो, सब मंगलमय ही देखो, कोई भी (जीव) दुःख को भोगने वाला ना हो |

- कठोपनिषद्

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