ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

किनकी बात पे संदेह ना करे

किनकी बात पे संदेह ना करे

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी | बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ||

माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना चाहिए

- श्री रामचरितमानस

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