ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

वीरभद्र चालीसा

वीरभद्र चालीसा

शिव का क्रोध चरम उपजायो। जटा केश धरा पर मार्‌यो॥
तत्‍क्षण टँकार उठी दिशाएँ । वीरभद्र रूप रौद्र दिखाएँ॥
रणक्षेत्र में ध्‍वँस मचायो । आज्ञा शिव की पाने आयो ॥
सिंह समान गर्जना भारी । त्रिमस्‍तक सहस्र भुजधारी॥

भगवान शंकर को जब सती के आत्मदाह की खबर मिलती हे तो वे क्रोधित हो गए और अपनी जटा से वीरभद्र नामक एक गण उत्पन्न किया।उत्पन्न होते ही वीरभद्र शिव की आज्ञा से तेजी से यज्ञ स्थल पहुंचा और उसने वहां की भूमि को रक्त से लाल कर दिया और बाद में दक्ष को पकड़कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

-वीरभद्र चालीसा

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