ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

विद्वान की परख

विद्वान की परख

विद्वानेव विजानाति विद्वज्जन परिश्रमम् |
न हि वन्ध्या विजानाति गुर्वी प्रसववेदनाम् ||

जो विद्वान होता हे वही विद्वान के परिश्रम को समज शकता हे , जैसे प्रसूति की वेदना बांझ नहीं समज शकती , वैसे ही बुद्धि को परख ने के लिए स्वयं के पास बुद्धि होना आवश्यक हे ||

comments powered by Disqus