ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

उपनिषद

उपनिषद

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ||

उपनिषद में आत्मतत्व का वर्णन करते हुए कहा हे की “जहा से वाणी भी निःशब्द हो वापस आ जाती हे ,मन भी जिसको नाप नहीं सकता ऐसा हे वह ब्रह्म “ ||

उपनिषद

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