ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

परिश्रम का महत्त्व

परिश्रम का महत्त्व

उदयमेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः |
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ||

कोई भी काम परिश्रम से ही सिद्ध होता हे , सिर्फ इच्छाकल्पित चिन्तन मात्र से नहीं | कोईभी प्राणी अपने आप सोते हुए शेर के मुँह में नहीं जाता ||

comments powered by Disqus