ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

चिंता की जननी इच्छा हे

चिंता की जननी इच्छा हे

चाह गई चिंता गई ,मनुआ बेपरवाह |
जिनहु कछू नहीं चाहिए , ते साहन के साह ||

अगर हमारी इच्छाएं समाप्त हो गई तो हमारी चिंताए भी समाप्त हो जाएगी | जिनकी इच्छा समाप्त हो जाती हे वह राजाओ के भी राजा हे |

-सत्संगसुवास अंक में से

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