ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

संत और असंत दोनों को वंदन

संत और असंत दोनों को वंदन

बंदउ संत असज्जन चरना | दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ||
बिछुरत एक प्राण हरी लेही | मिलत एक दुःख दारुन देहि ||

में संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करता हु , दोनों ही दुःख देने वाले हे | किन्तु दोनों में अंतर यह हे की संत का बिछुड़ना इतना दुखदायी होता हे की हमारे प्राण निकल जाते हे(बहुत दुःख होता हे) , इसके विरूद्ध असंत मिलते समय ही दारूण दुःख देता हे ||

-श्री रामचरितमानस

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