ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

इन्हे वश में करे

इन्हे वश में करे

लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमंजलिकर्मणा |
मूर्खश्छन्दानुरोधेन यथार्थवादेन पण्डितम् ||

यहां आचार्य चाणक्य वशीकरण के सम्बन्ध में बताते हैं कि लालची को धन देकर, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उपदेश देकर तथा पंडित को यथार्थ बात बताकर वश में करना चाहिए |

भाव यह है कि लालची व्यक्ति को धन देकर कोई काम कराना हो तो उसके सामने हाथ जोड़कर, झुककर चलना चाहिए | मूर्ख व्यक्ति को केवल समझा-बुझाकर ही वश में किया जा सकता है | विद्वान व्यक्ति से सत्य बात कहनी चाहिए, उन्हें स्पष्ट बोलकर ही वश में किया जा सकता है |

-आचार्य चाणक्य

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