ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

चार प्रकार के भक्त

चार प्रकार के भक्त

जपहि नामु जन आरत भारी | मिटहि कुसंकट होहिं सुखारी ||
राम भगत जग चारि प्रकारा | सुकृति चारिउ अनघ उदारा ||

आर्त भक्त(संकट में गभराये हुए) नामजाप करते हे तो उनके संकट दूर हो जाते हे और वे सुखी हो जाते हे |

जगत में चार प्रकार के भक्त हे :

१. अर्थाथी - धन की आशा से भजने वाले
२. आर्त - संकट में भजने वाले
३. जिज्ञासु - भगवान को जानने की इच्छा रखने वाले
४. ज्ञानी - भगवान को तत्व से जानकर भजने वाले

और चारो ही पुण्यात्मा , पापरहित और उदार हे ||

-श्रीरामचरितमानस

comments powered by Disqus