ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

बंदउँ नाम राम रघुबर को | हेतु कृसानु भानु हिमकर को ||
बिधि हरी हरमय बेद प्रान सो |अगुन अनुपम गुन निधान सो ||

में श्रीरघुनाथजी के नाम “राम” की वंदना करता हु , जो कृशानु(अग्नि), भानु(सूर्य) और हिमकर(चन्द्रमा) का हेतु अर्थात “र” , “आ” और “म” रूप से बीज हे . वह राम नाम ब्रह्मा , विष्णु और महेश स्वरुप हे . वह वेदो का प्राण ,निर्गुण , उपमारहित और गुणों का भंडार हे

-श्रीरामचरितमानस

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