ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

अंतर के तेज की खोज में - सत्य घटना

अंतर के तेज की खोज में - सत्य घटना

पारसनाथ (परमपूज्य श्री पुनिताचारीजी महाराज) को थलतेज(अमदावाद) अन्तर के तेज की खोज के लिए अनुकूल लगा (यह बात बहोत साल पहले की हे जब अमदावाद का आज का थलतेज शहर की बहोत बहार हुआ करता था) पारसनाथजी वही पर अपनी आगे की साधना करने बैठ गए . थोड़े समय के बाद थलतेज के तीन युवान उनके दर्शन के लिए नित्य आने लगे और गांव जा कर पारसनाथजी के गुणगान गाते !

उस साल बारिश नहीं हुई . खेती पर निर्वाह करनेवाले किसान चिंता में थे. गांव की महिलाओ ने ढूंढिया महाराज को गांव में घुमा कर प्रार्थना की लेकिन बारिष नहीं हुई. गांव वालो का धैर्य जवाब देने लगा , तब गांव के लोगो ने उन तीन युवको में से रमतू नाम के युवक को उपहास करते हुए कहा : “अरे रमतू ! तू रोज महाराज के पास जाता हे और आकर उनके चमत्कार की बड़ी बड़ी बाते करता हे , तो बोल तुम्हारे महाराज को की बारिश करदे !!!

रमतू को यह उपहास सहन नहीं हुआ . और उसने गुस्से में मानता ले ली की - “हे पारसनाथ !! हे बापू !! हे महादेव !! अगर आज शाम तक थलतेज में बारिश हो तो हे महाराज ! में महादेव के शिवलिंग को पूरा दूध से पूरा डुबाऊँगा

थोड़े ही समय में आकाश में काले बादल आने लगते हे , सब ज्योतिष और भुवा लोग ने बोल दिया था की अब बारिश के कोई आसार नहीं हे. तभी बहोत ही तेज बारिश शुरू हो जाती हे ..सब जगह पानी पानी हो जाता हे .. गांव में सभी लोग बहुत खुश हो जाते हे.. और बहोत ही धामधूम से गांव के सभी लोग दूध ले कर निकलते हे.. थलतेज महादेव के शिवलिंग को दूध से डुबाने…

थलतेज टेकरी पे चढ़ते ही सभी देखते हे की पारसनाथ (प. पु. पुनीताचारिजि महाराज) पानी से पुरे भीगे हुए हे . और शिवलिंग के आसपास मट्टी से पाड़ बना रहे थे . रमतू दौड़कर उनके पांव में गिर पड़ता हे , और बोलता हे “बापू! आप इतनी बारिश में यहाँ क्या कर रहे हो ?” पूज्य बापुश्री बहोत ही करुणाभरे श्वर में कहते हे “बेटा तेरी मानता पूरी कर रहा हूँ . तूने तो उत्साह में मानता रख ली की पुरे शिवलिंग को दूध में डुबाऊँगा , लेकिन इस शिवलिंग के आसपास पाड ही नहीं हे की तू दूध भरके अपनी बाधा पूरी कर शके . बारिश के कारण मिट्टी भी टिक नहीं रही इसीलिए में और मिट्टी रख रहा हूँ . जल्दी से अपनी मानता पूरी कर और भविष्य में सोच समझकर मानता रखना

इसको कहते हे गुरु - संत . गुरु महिमा को आप कौनसे शब्दों में व्यक्त करोगे ? शिष्य की गरिमा और मान बचाने गुरु हमेशा जागते रहते हे . शिष्य के कल्याण के अतिरिक्त उनकी और कोई इच्छा नहीं होती.. ऐसे गुरुदेव की जय हो … जय हो

(यह घटना प. पु. पुनीताचारिजि महाराज के साधना समय की थलतेज में घटी घटना में से हे)

पूज्य पुनीत महाराज गुजरात के गिरनार क्षेत्र में अभी भी बिराजमान हे. उन्होंने ५० साल की कठिन तपस्या के बाद दत्तात्रेय भगवन से “हरी ॐ तत्सत जय गुरु दत्त” यह मंत्र वरदान के रूप में प्राप्त किया हे.

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