ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

सात प्रकार के स्नान

सात प्रकार के स्नान

योगसंहिताशास्त्र में ७ प्रकार के स्नान बताये हे , जो इस प्रकार हे :

  1. मंत्रस्नान : मंत्रोच्चार के साथ जल को शरीर पे छिड़कना
  2. भौमस्नान : गीले कपडे से शरीर को ठीक से साफ करना
  3. आग्नेयस्नान : शरीर पर भस्म का लेप करना
  4. वायव्यस्नान : गाय की चरण रज को स्पर्श या शरीर पर लेप करना
  5. दिव्यस्नान : धुप हो और उसी समय शरीर पर वर्षा की बून्द पड़ना
  6. वरुणस्नान : जलाशय के पानी में डुबकी लगाके स्नान करना
  7. मानसस्नान : विष्णु या शिव के गुणों का चिंतन करना

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