ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

संकल्प शक्ति - नीम का पेड़ चला - सत्य घटना

संकल्प शक्ति - नीम का पेड़ चला - सत्य घटना

परम पूज्य लीलाशाहजी महाराज के जीवन की एक घटना बताता हूँ |

सिंध में उन दिनों किसी जमीन की बात में हिन्दू और मुसलमानों का झगड़ा चल रहा था | उस जमीन पर नीम का एक पेड़ खड़ा था, जिससे उस जमीन की सीमा-निर्धारण के बारे में कुछ विवाद था | हिन्दू और मुसलमान कोर्ट-कचहरी के धक्के खा-खाकर थके | आखिर दोनों पक्षों ने यह तय किया कि यह धार्मिक स्थान है | दोनों पक्षों में से जिस पक्ष का कोई पीर-फकीर उस स्थान पर अपना कोई विशेष तेज, बल या चमत्कार दिखा दे, वह जमीन उसी पक्ष की हो जायेगी || पूज्य लीलाशाहजी बापू का नाम पहले ‘लीलाराम’ था| लोग पूज्य लीलारामजी के पास पहुँचे और बोले: “हमारे तो आप ही एकमात्र संत हैं| हमसे जो हो सकता था वह हमने किया, परन्तु असफल रहे | अब समग्र हिन्दू समाज की प्रतिष्ठा आपश्री के चरणों में है || अब संत कहो या भगवान कहो, आप ही हमारा सहारा हैं| आप ही कुछ करेंगे तो यह धर्मस्थान हिन्दुओं का हो सकेगा |

इंसाँ की अज्म से जब दूर किनारा होता है | तूफाँ में टूटी किश्ती का एक भगवान किनारा होता है |

संत तो मौजी होते हैं | जो अहंकार लेकर किसी संत के पास जाता है, वह खाली हाथ लौटता है और जो विनम्र होकर शरणागति के भाव से उनके सम्मुख जाता है, वह सब कुछ पा लेता है | विनम्र और श्रद्धायुक्त लोगों पर संत की करुणा कुछ देने को जल्दी उमड़ पड़ती है |

पूज्य लीलारामजी उनकी बात मानकर उस स्थान पर जाकर भूमि पर दोनों घुटनों के बीच सिर नीचा किये हुए शांत भाव से बैठ गये | विपक्ष के लोगों ने उन्हें ऐसी सरल और सहज अवस्था में बैठे हुए देखा तो समझ लिया कि ये लोग इस साधु को व्यर्थ में ही लाये हैं | यह साधु क्या करेगा …? जीत हमारी होगी ||

पहले मुस्लिम लोगों द्वारा आमंत्रित पीर-फकीरों ने जादू-मंत्र, टोने-टोटके आदि किये| ‘अला बाँधू बला बाँधू… पृथ्वी बाँधू.. तेज बाँधू… वायू बाँधू… आकाश बाँधू… फूससस’ आदि-आदि किया| फिर पूज्य लीलाराम जी की बारी आई ||

पूज्य लीलारामजी भले ही साधारण से लग रहे थे, परन्तु उनके भीतर आत्मानन्द हिलोरे ले रहा था | ‘पृथ्वी, आकाश क्या समग्र ब्रह्माण्ड में मेरा ही पसारा है… मेरी सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता… ये चाँद-सितारे मेरी आज्ञा में ही चल रहे हैं… सर्वत्र मैं ही इन सब विभिन्न रूपों में विलास कर रहा हूँ…’ ऐसे ब्रह्मानन्द में डूबे हुए वे बैठे थे | ऐसी आत्ममस्ती में बैठा हुआ किन्तु बाहर से कंगाल जैसा दिखने वाला संत जो बोल दे, उसे घटित होने से कौन रोक सकता है ? वशिष्ठ जी कहते हैं: “हे रामजी ! त्रिलोकी में ऐसा कौन है, जो संत की आज्ञा का उल्लंघन कर सके ?”

जब लोगों ने पूज्य लीलारामजी से आग्रह किया तो उन्होंने धीरे से अपना सिर ऊपर की ओर उठाया | सामने ही नीम का पेड़ खड़ा था | उस पर दृष्टि डालकर गर्जना करते हुए आदेशात्मक भाव से बोल उठे | ऐ नीम ! इधर क्या खड़ा है ? जा उधर हटकर खड़ा रह ||

बस उनका कहना ही था कि नीम का पेड़ ‘सर्रर्र… सर्रर्र…’ करता हुआ दूर जाकर पूर्ववत् खड़ा हो गया | लोग तो यह देखकर आवाक रह गये ! आज तक किसी ने ऐसा चमत्कार नहीं देखा था | अब विपक्षी लोग भी उनके पैरों पड़ने लगे वे भी समझ गये कि ये कोई सिद्ध महापुरुष हैं |

वे हिन्दुओं से बोले : “ये आपके ही पीर नहीं हैं बल्कि आपके और हमारे सबके पीर हैं | अब से ये ‘लीलाराम’ नहीं किंतु लीलाशाह’ हैं |” तब से लोग उन्हें लीलाशाह’ नाम से ही पुकारने लगे | लोगों ने उनके जीवन में ऐसे-ऐसे और भी कई चमत्कार देखे ||

संत ज्ञानेश्वर महाराज जिस चबूतरे पर बैठे थे, उसीको कहा: ‘चल…’ तो वह चलने लगा | ऐसे ही पूज्यपाद लीलाशाहजी बापू ने नीम के पेड़ को कहा : ‘चल…’ तो वह चलने लगा और जाकर दूसरी जगह खड़ा हो गया| यह सब संकल्प बल का चमत्कार है | ऐसा संकल्प बल आप भी बढ़ा सकते हैं |

विवेकानन्द कहा करते थे कि भारतीय लोग अपने संकल्प बल को भूल गये हैं, इसीलिये गुलामी का दुःख भोग रहे हैं | हम क्या कर सकते हैं. ऐसे नकारात्मक चिंतन द्वारा वे संकल्पहीन हो गये हैं जबकि अंग्रेज का बच्चा भी अपने को बड़ा उत्साही समझता है और कार्य में सफल हो जाता है, क्योंकि वे ऐसा विचार करता है | मैं अंग्रेज हूँ | दुनिया के बड़े भाग पर हमारी जाति का शासन रहा है | ऐसी गौरवपूर्ण जाति का अंग होते हुए मुझे कौन रोक सकता है सफल होने से ? मैं क्या नहीं कर सकता ?’ ‘बस, ऐसा विचार ही उसे सफलता दे देता है |

जब अंग्रेज का बच्चा भी अपनी जाति के गौरव का स्मरण कर दृढ़ संकल्पवान् बन सकता है, तो आप क्यों नहीं बन सकते ?

मैं ऋषि-मुनियों की संतान हूँ | भीष्म जैसे दृढ़प्रतिज्ञ पुरुषों की परम्परा में मेरा जन्म हुआ है | गंगा को पृथ्वी पर उतारनेवाले राजा भगीरथ जैसे दृढ़निश्चयी महापुरुष का रक्त मुझमें बह रहा है | समुद्र को भी पी जानेवाले अगस्त्य ऋषि का मैं वंशज हैं | श्री राम और श्रीकृष्ण की अवतार-भूमि भारत में, जहाँ देवता भीजन्म लेने को तरसते हैं वहाँ मेरा जन्म हुआ है, फिर मैं ऐसा दीन-हीन क्यों? मैं जो चाहूँ सो कर सकता हूँ | आत्मा की अमरता का, दिव्य ज्ञान का, परम निर्भयता का संदेश सारे संसार को जिन ऋषियों ने दिया, उनका वंशज होकर मैं दीन-हीन नहीं रह सकता | मैं अपने रक्त के निर्भयता के संस्कारों को जगाकर रहूँगा | मैं वीर्यवान् बनकर रहूँगा |

ऐसा दृढ संकल्प हर एक भारतीय बालक को करना चाहिए |

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