ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

समर्थ रामदास स्वामी के प्रिय शिष्य कल्याण

समर्थ रामदास स्वामी के प्रिय शिष्य कल्याण

एकबार समर्थ रामदास स्वामी उनके शिष्यवृन्द के साथ सुन्दर वन में विहार कर रहे थे। कल्याण नाम के एक शिष्य ने उनकी बहोत सेवा की थी। उसकी गुरु भक्ति से रामदास स्वामी बहोत खुश थे इसीलिए उनकी आखरी कसौटी कर परमात्मा का साक्षात्कार करवाकर अपने शिष्यवृन्द को बोध देना चाहते थे।

एक कुवें के नजदीक आम के पेड़ पर पक्का आम देख रामदास स्वामी बोले :”वह आम खाने की मेरी बहोत इच्छा हो रही हे “ । यह सुनते ही कल्याण आम के पेड़ पे चढ़ ने लगा। और कोई शिष्य यह हिम्मत नहीं दिखा पाया क्यूंकि गुरु ने जो आम पसंद किया था वह बहोत ही पतली टहनी पर था और वह कुवें की और झुकी हुई थी। वह आम तोड़ने जाना यानी मौत के मुँह में जाना।

खुद आम तोड़ने ना जाने से शर्मिंदा हुए शिष्य गुरु क्क प्रेम जितने के लिए गुरु के प्रिय शिष्य कल्याण के प्रति अपनी हमदर्दी दिखाने लगे और बोले “अरे कल्याण ! जरा संभलकर । टहनी बहोत पतली हे। कही कुवें में गिर मत जाना , इसीलिए संभलकर आगे बढ़। “ समर्थ रामदास अपने मन में ही हँस रहे थे क्यूंकी यही शिष्य पहले कल्याण के बारे में बहोत शिकायत ले कर आ रहे थे।

गुरुभक्त कल्याण के मुख में राम नाम का जाप , दृष्टि गुरु कार्य में और हृदय में गुरु प्रेम था. आज तो समर्थ रामदास बहोत ही प्रसन्न थे। कल्याण का भजन-गुरुप्रेम चरम सिमा पर था। लेकिन यह क्या ? जैसे ही कल्याण ने पतली टहनी पर लटका आम पकड़ा और डाली टूट गई और कल्याण सीधा कुवें के अंदर गिर गया। समर्थ रामदास ने अपनी संकनलप शक्ति से दूसरी ही क्षण कल्याण को बचा लिया और क्षणमात्र में कुवें के अंदर ही श्री रामचंद्र भगवान् के दर्शन करा दिए और आत्मसाक्षात्कार करवादिया।

सदगुरु की करुणा अनंत , अनंत किया उपकार।
लोचन अनेक उघाड्या , अनंत दिखावनहार।।

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