ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

भगवान दत्त अवतार - रहस्य

भगवान दत्त अवतार - रहस्य

“जन्म” और “अवतार” के बिच में जमीन और आसमान जीतना अंतर होता हे। “अवतार” शब्द “अव + तृ” इन दो शब्द से बना हुआ हे अर्थात अवतरण होना - उतरना - नीचे आना - शरीर धारण करना। कोई दिव्य चेतन शक्ति मानव देह धारण करने अपने स्थान से नीचे आते हे तब उसे “अवतार होना “ कहते हे। अर्थात साधारण मानव का जन्म होता हे जब की अलौकिक शक्ति का “अवतार” होता हे।

शास्त्रों में लीलावतार , कलावतार , आवेशावतार , अंशावतार जैसे विविध प्रकार के अवतार के प्रकार बताये गए हे. वायु पुराण में दिव्यसंभूति अवतार और मानवसम्भूति अवतार ऐसे दो प्रकार बताये गए हे। नारायण ,नृसिंह , वामन आदि में दैवी तत्व प्रधान होने से इन्हे “दिव्यसंभूति अवतार” जब की परशुराम , राम , कृष्ण आदि में मानवीय तत्व प्रधान होने से इन्हे “मानवसम्भूति अवतार” कहा गया हे।

ब्रह्म के अवतार के पीछे बहुत ही गूढ़ रहस्य होता हे। भगवान् के अन्य अवतारो में दुष्टो का दमन और संहार का हेतु हे जब की भगवान् दत्तात्रेय के अवतार के पीछे अज्ञान के विनाश का हेतु हे। इसी लिए उनको “विश्वगुरु” माना जाता हे। ब्रह्मपुराण में स्पष्ट बताया गया हे की विश्व कल्याण , वेदोद्धार चतुर्वंंणर्य की पुनः स्थापना , अध्ययन , अध्यापन का महत्त्व आदि के लिए भगवान दत्तात्रेय का अवतार हुआ हे।

भगवान् दत्तात्रेय के अवतार की दूसरी विशिष्टता ये हे की “अयोनिजा भविष्यन्ति तव पुत्र वरानने” अर्थात वह “आयोनिज संतान” थे। उनका जन्म सती अनसूया के स्थूल गर्भ से नहीं लेकिन महर्षि अत्रि के तेज से हुआ था। तदुपरांत शास्त्रों में कही पर भी उनके स्वधामगमन या देहविलय का उल्लेख नही हे। भगवान् दत्तात्रेय आज भी जीवित हे और जब तक विश्व में अज्ञान का अस्तित्व हे तब तक जीवित रहेंगे।

ऐसे कई करणो से भगवान् के कई अवतार में से दत्तावतार थोड़ा अलग हे , इसी लिए संतो कहते हे की “भो दत्त कस्त्वत्पर” अर्थात भगवान् दत्तात्रेय से और कोई देव बड़ा नहीं हे।

पुराणों के अनुसार भगवान् दत्तात्रेय वह महर्षि अत्रि और महासती अनसूया के वहा प्रगट हुए थे। त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा-विष्णु-महेश से प्रसिद्द हे। ऐसे , तीन मस्तक और छः हाथ धारण कीए हुए हे और हर एक हाथ में आयुध (यानिकि शस्त्र) हे। चार श्वान और गाय सदा उनके साथ रहते हे। इन् सब प्रतीकों के पीछे बहुत ही गूढ़ रहस्य हे। साधक मनन-चिंतन-ध्यान के द्वारा विस्तृत जानकारी ले सकते हे यहाँ तो सिर्फ दिशा सूचन किया गया हे।

यह लेख सत्संग सुवास से लिया गया हे . पूज्य पुनीत महाराज गुजरात के गिरनार क्षेत्र में अभी भी बिराजमान हे . उन्होंने ५० साल की कठिन तपस्या के बाद दत्तात्रेय भगवन से “हरी ॐ तत्सत जय गुरु दत्त” यह मंत्र वरदान के रूप में प्राप्त किया हे .

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