ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

शंकराचार्य

शंकराचार्य

मान्यता हे की शंकराचार्य को भगवान् ने आठ साल का आयुष्या दिया था , जिसमे उनका बचपन भी पूर्ण नहीं होता . लेकिन शंकराचार्य ने आठ साल की उम्र में वेदाभ्यास पूर्ण किया और सन्यास ग्रहण करके मृत्यु के सामने उयस्थित हो गए और बोले की “में आ गया हु” . तब यमराज बोले की भगवन ने आपका आयुष्य बढ़ा दिया हे और आदेश दिया हे की “प्रमाणग्रंथो का संग्रह करके वैदिक धर्म को और मजबूत बनाइए” . यह आदेश पाते ही ध्यान-चिंतन-मनन साक्षात्कार की प्रक्रिया द्वारा वैदिक धर्म के समन्वय को मन में दृढ किया और सोलह साल की उम्र में “ब्रह्म सूत्र” भाष्य की रचना कर दी .यह ग्रन्थ महर्षि बादरायनाचार्य को समर्पित करके फिर से मृत्यु के सामने हाजिर हो गए . यमराज ने फिर से कहा की भगवन ने आपका आयुष्य फिर से दो गुना कर दिया हे , अब इस ग्रन्थ के आधार पर ब्रह्मविद्या का प्रचार कीजीऐ . इस आदेश को मान कर लगातार सोलह साल परिभ्रमण कर निश्चित समय पर ३२ साल की उम्र में समाधि से अपने देह का त्याग किया .

बोध - शुभ कार्य में लगे रहो भगवान् खुद दीर्घायु देंगे

comments powered by Disqus