ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

कावडीबुवा

कावडीबुवा

माता - पिता को कांवड़ में बिठा कर यात्रा करने वाले श्रवण कुमार को हर कोई जानता हे . अपनी पीठ पर कावड़ उठा कर ले जाने वाले श्रवण कुमार अमर हो गए .

लेकिन कलयुग में और वह भी इन ३०० सालो में ऐसे ही एक और श्रवण कुमार हो गए. माता-पिता को कावड़ में बिठा कर कावड़ में यात्रा करने वाले यह दूसरे श्रवण कुमार का नाम था कावडीबुवा. असल में उनका नाम था विठल और पिता का नाम अनंतराव .लोग उनको “अनंतसुत कावडीबुवा” कहकर याद करते हे.

महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले के पारनेर तालुका के पिसापल गाम के वह रहने वाले. १७९७ के अप्रैल महीने की ११ तारीख को उनका जन्म हुआ. चैत्र सूद पूनम का वह दिन था. ऋग्वेदी ब्राह्मण थे वह. उनका गोत्र था भरद्वाज.गाम के कुलकर्णी थे. ईश्वर के भजन और मात पिता की सेवा में तल्लीन रहने वाले. पिता अनंतराव और माता राधाबाई वृद्ध हो गए और उनको यात्रा करने की इच्छा हुई. एक मजदुर और एक घोड़े को साथ लेकर विठाल ने यात्रा आरम्भ की. अपनी पीठ पर कावड़ रख कर यात्रा आरम्भ करने वाले विठल “कावडीबुवा” नाम से प्रसिद्द हुए. माताजी का स्वर्गवास गयाजी में हुआ और पिता ब्रह्मव्रत में स्वर्गवासी हुए. खाली पड़े कावड़ में विठल ने एक तरफ भगवान विठल और दूसरी तरफ रुक्मणि की मूर्ति की प्रतिष्ठा कर अपनी यात्रा चालु रखी.

इसी तरह यात्रा के दौरान वाह गालवक्षेत्र में ठहरे थे .उसी दिन दत्तात्रेय जयंती थी. गाम में कीर्तन के लिए कोई कीर्तनकार था नहीं इसीलिए गाम वालो ने बुवा को कीर्तन के लिए बुलाया .लेकिन “मुझे कैसे आएगा” ऐसा वह गाम वालो को समजा रहे थे तभी , भगवान दत्तात्रेय ब्राह्मण वेश में आकर उनको कीर्तन करने और ग्रन्थ लिखने की आज्ञा की, और प्रसाद दे कर बोले की “में तुम्हारे साथ ही हु चिंता मत कर”. कीर्तन पूर्ण कर उन्होंने आगे की यात्रा आरम्भ की . कीर्तन लोगो को बहुत ही पसंद आया . ग्रन्थ कैसे लिखेंगे यही चिंता में उन्होंने ग्रन्थ लिखना आरम्भ ही नहीं कीया था. यह देख भगवन दत्तात्रेय फिर से ब्राह्मण वेश में आये और ग्रन्थ लिख ने की आज्ञा की और बोले की “में हर प्रकार से तेरी मदद करूँगा”. यह वरदान पा कर एक दिन वह उज्जैन पहुंचे. तब उन्होंने “श्री दत्त प्रबोध” नाम के ग्रन्थ के ४० अध्याय लिखे. उसके बाद उन्होंने द्वारका जाने की विचारसे यात्रा आरम्भ की. १८५६ में वड़ोदरा आये. शुरुआत में उनका ठहरना वाडी के श्रीमंत राजे पांढरे के राम मंदिर में हुआ. वड़ोदरा में उस समय कई महान संत महंत के सत्संग से उनको बहुत प्रसन्नता हुई. वड़ोदरा में यह मातृ-पितृ भक्त शिरोमणि कावडीबुवा के अनेक लोग शिष्य बने, उन्ही में से एक शिष्य ने उन्हे बरनपुर चौखंडी रस्ते पे श्री राम मंदिर बनवाकर उनको वही रहने का आग्रह कर रोक लिया. इसी श्री राम मंदिर में कावड़ में लाये हुए श्री विठलनाथजी और रुक्मणि की मूर्ति की स्थापना कर संवत १९१५ में वह रहने आये. इसी मंदिर में रह कर उन्हों ने “श्री दत्त प्रबोध” के बाकी के २१ अध्याय लिखे. ऐसे ६१ अध्याय के इस ग्रन्थ को संवत १९१६ में चैत्र सूद एकम को लिख कर पूर्ण किया .

ऐसे ही वड़ोदरा में श्री सेवा और चिंतन में जीवन व्यतीत करते हुए संवत १९१९ को वैकुण्ठवासी हुए , लेकिन वह ग्रन्थ के रूप में अमर होने से आज भी कई दत्त भक्तो को मार्ग दर्शन देते हे .

यह लेख सत्संग सुवास से लिया गया हे . पूज्य पुनीत महाराज गुजरात के गिरनार क्षेत्र में अभी भी बिराजमान हे . उन्होंने ५० साल की कठिन तपस्या के बाद दत्तात्रेय भगवन से “हरी ॐ तत्सत जय गुरु दत्त” यह मंत्र वरदान के रूप में प्राप्त किया हे .

comments powered by Disqus