ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

रघुनाथ भट्टजी (अद्वैतेश्वर)

रघुनाथ भट्टजी  (अद्वैतेश्वर)

नर्मदा नदी के तट पर भृगुक्षेत्र में ज्ञानवर्धन नमक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ तपस्चर्या कर रहा था. दोनों शिव भक्क्त थे. दोनों यही प्रार्थना करते थे की “भृगुऋषि जैसा बेटा देना”. लेकिन पुत्ररत्न प्राप्त होने से पहले ही दोनों ने नर्मदा के जल में देह त्याग कर दिया. कर्नाटक राज्य की मालप्रभा नदी के किनारे ज्ञानवर्धन ने विश्वनाथ नाम के ब्राह्मण के यहाँ जन्म लिया था .

भृगुक्षेत्र के अधिष्ठाता भृगुऋषि भी उस समय नर्मदा के किनारे अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे. उसी समय उनको नाशिक की गोदावरी गंगा का माहात्म्य सुनने में आया. और उनको गोदावरी की किनारे अवतार ले कर लीला करने का विचार आता हे .

उसी समय भगवन दत्तात्रेय, वशिष्ठ मुनि और भगवन शंकर भृगुऋषि की आश्रम में पधारते हे और ज्ञानवर्धन दंपत्ति ने जिस तरह अपने प्राण त्याग किये वह बात कहते हे. गोदावरीगंगा की किनारे आगे की लीला करने क़े लिए यह सब सम्मत होते हे . ज्ञानवर्धन ने की हुई तपश्या का फल इस तरह उसको मिलने वाला था .

कर्णाटक राज्य की मालप्रभा नदी क़े किनारे विश्वनाथ की यहाँ ज्ञानवर्धन ने जन्म लिया था . बहुत समय क़े बाद जब विश्वनाथ भट्ट क़े यहाँ संतान प्राप्ति का योग आता हे तब गणपतिजी खुद विश्वनाथ के स्वप्न में आ कर कहते हे की : तुम्हारे यहाँ एक महातपस्वी का जन्म होने वाला हे . उसका नाम गणपति रखना . उसके पेट से भृगुऋषि , शंकर , पार्वती जन्म लेंगे और अनेक जीवो का उद्धार करेंगे .

गणपति बड़ा हुआ. वह महातेजस्वी था. उसकी शादी काशीनाथ भट्ट की चिमबाई के साथ हुई. कुछ समय क़े बाद गणपति के वहा रघुनाथ का जन्म होता हे, यह रघुनाथ ही भृगुऋषि स्वयं थे .

जब गणपति रघुनाथ क़े शादी के बारे में सोचने लगे तब यह रघुनाथ को पसंद नहीं आया. और सब को सोता हुआ देख घरत्याग करके, बहोत कष्ट और यातना सहन कर गोदावरीगंगा क़े किनारे की और प्रयाण करते हे. तपस्यामय इस यात्रा क़े अंत में रघुनाथ नाशिक पहुचते हे और बाजीराव फडके नाम क़े एक सात्विक सुखी गृहस्थ से मिलते हे. फड़के रघुनाथ की और समर्पित होते गए और उनको वही पर रोक लिया .

रघुनाथ एक महायोगी हे यह बात धीरे धीरे फड़के और अन्य लोगो को पता चली. उस समय क़े प्रखर पंडित जोगलेकर शास्त्री को भी रघुनाथ महाराज की महत्ता समजाइ. किसी समय रघुनाथ जमीन से ऊपर उठकर आसन लगाकर बैठे हुए होते, तो किसी समय जमीन से ऊपर चलते होते वह भी बहोत तीव्र गति से, ऐसा कई लोगो ने देखा था .

एकबार गोदावरी गंगा के किनारे तपस्या कर रहे रघुनाथ को भगवान् दत्तात्रेय मिलते हे. दोनों एक दूसरे को पहचान गए. जिस जगह रघुनाथ ध्यान करते वहा भगवन दत्तात्रेय कई बार आते और दोनों बाते करते. रघुनाथ क़े शिष्य निरंजन ने दरवाजे की थोड़ी सी जगह में से इन् दोनों विभूति को बाते करते हुए देखा था. निरंजन शिष्य ने लिखे हुए ओवीबद्ध जीवनचरित्र में अपने गुरु रघुनाथ की पूर्ण जानकारी दी हे.

निरंजन को गिरनार शिखर पर भगवान् दत्तात्रेय के प्रत्यक्ष दर्शन का लाभ मिलता हे. तब दत्तात्रेय भगवन ने उनसे कहा था की “में और रघुनाथ दोनों एक ही हे”

भृगुऋषि क़े अवतार रघुनाथ भटटजी ने भगवन दत्तात्रेय कि मंदिर जिसमे एकमुखी मूर्ति की प्रतिष्ठा की हुई हे उसे गोदावरीगंगा क़े किनारे बनाया था. अभी इसके बाजु में “होल्कर ब्रिज” नाम का पूल गंगा क़े ऊपर बनाया गया हे. पंचवटी क़े दानाबंकर विभाग क़े इस मंदिर क़े पिछले भाग में रघुनाथ की जिवंत समाधी हे. इस समाधी मंदिर “अद्वैतेश्वर” नाम से प्रसिद्द हुआ हे. यह समाधी जाग्रत मानी जाती हे. किसी किसी को यहाँ रघुनाथजी क़े दर्शन भी हुए हे .

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