ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

रहस्य कोई कोई जाने

रहस्य कोई कोई जाने

परोपराय इदं शरीरम” अर्थात यह शरीर परोपकार के लिए हे यह वाक्य वास्तव में संत सिद्ध कर देते हे . संतो की प्रत्येक क्षण परोपकार के लिए ही होती हे लेकिन यह परोपकार करने के लिए उनको कठिन साधना करनी पड़ती हे. कई साल तक कई घंटो का भजन और तपस्या संकल्प रूप में दे देते हे यह समज होनी चाहिए , लेकिन आज का मानवी महास्वार्थी बनके संतो की समक्ष दलील करने में लग जाता हे. शरणागत भक्तो के कई काम सद्गुरु कर देते हे, लेकिन एक दो बार आकर अपने स्वार्थ की लम्बी यादि बता देते हे उन लोगो को यह बात याद रखनी चाहिए . हठाग्रह से बहार निकलो . सहज रूप से स्वीकार करने की वृत्ति होनी चाहिए .

प.पु.पुनीत बापुश्री के पास कोई ब्लड कैंसर का पेशेंट आता हे. कृपालु बापुश्री ने उसके इस जन्म की या अगले कोई जन्म की सेवा से प्रसन्न हो गए और थोड़ी सी भस्मी संकल्प कर के दे दी , और उसका यह रोग मीट गया .

यह बात सुनकर किसी व्यक्ति ने बहोत आग्रह किया की मुझे भी भस्मी चाहिए. संत बहोत ही सहनशील होते हे और बहोत ही बुद्धिशाली भी. गूढ़ार्थ में अलग ही तरीके से “हां” या “ना” का रहस्य समजा देते हे. पूज्यश्री ने उस को “ना” कहने के बदले बोलै की : आश्रम की गौशाला में अनेक गाय हे . उन गायो के गोबर को सुखाया गया हे. उनको तू लेजा और उनको जला कर जो भस्म तैयार हो उसको जब तक तू जिये तब तक लेता रे. तेरा रोग मिटे या नहीं वो तेरा नसीब. और वह आदमी ऊँचे आवाज में बोला की : “आपने सिर्फ १ बार भस्मी दे कर उसका ब्लड कैंसर मिटा दिया , और मुझे पूरी जिंदगी भस्मी लेने को बोल रहे हो ? “. तब बापुश्री ने बोला की, उसे भस्मी देते समय मैंने अपनी हर रोज की १५ से १६ घंटे की तपस्या का ७ साल की तपस्या का फल अर्पण किया था तब उसका रोग मीट पाया. उसने मुझे उसका जीवन समर्पित किया था इसीलिए मैंने ऐसा किया, जबकि तुम तो यहाँ पहली बार आकर ऊँचे स्वर में दलील कर रहे हो इसी लिए तुम्हे दूसरा रास्ता दिखाया.

प.पु.पुनीत बापुश्री सत्संग के समय बोध देते ही हे की : आप अपनी सम्पत्ति में से छोटी रकम दे कर मेरी तपस्या की बहोत बड़ी संपत्ति ले जाते हो यह बात आप लोगो को समज नहीं आता. आप लोगो के पैसे और चेक हर कोई देख सकता ह . आपके थोड़े घंटो की या दिन की सेवा आप पूरी दुनिया को दिखते हो, लेकिन में सूक्षम रूप में जो आशीर्वाद देता हु वह किसी को दिखाई नहीं देता. उसकी आपको कोई कदर नहीं, फिर भी आप सब के लिए “हरी ॐ तत्सत जय गुरु दत्त” महामंत्र लाया हु जो कामधेनु सामान हे .इस मंत्र की सकाम या निष्काम उपासना करके आप इच्छित रिद्धि-सिद्धि प्राप्त कर शकते हो. इस मंत्र से क्या नहीं मिल शकता यह बोलिये. सब मनोरथ सिद्ध होते हे. यह मंत्र आप लोगो को दे कर में अपनी फरज में से मुक्त होता हु. आप स्वयं साधना करे और सहज रूप से प्राप्त इस मंत्र की कदर करे.

यह लेख सत्संग सुवास से लिया गया हे . पूज्य पुनीत महाराज गुजरात के गिरनार क्षेत्र में अभी भी बिराजमान हे . उन्होंने ५० साल की कठिन तपस्या के बाद दत्तात्रेय भगवन से “हरी ॐ तत्सत जय गुरु दत्त” यह मंत्र वरदान के रूप में प्राप्त किया हे .

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