ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

निर्मल मन हरी को भाता हे

निर्मल मन हरी को भाता हे


गीता रामायण वेद शास्त्र , यदि कुछ भी न तुजको आता हे |
हरी गुरु चरण में मन को लगा , निर्मल मन हरी को भाता हे ||
चलते फिरते उठते बैठे , उसके ही अंदर रमा करो |
जब तड़प उठो बैचेनी में , वह पास खड़ा दिल भर देखो ||
जप तप होमादिक तर्पण में , जब तक अहंकार हे बैठा |
बलबुद्धि दान पुण्य के मद में ,कोई भले चले ऐंढ़ा सेंढा ||
तब तक वह अनदेखा सावन ,अंदर हँसता बैठा बैठा |
जो त्राहिमाम शरणागत हो , गोदी लेता हँसता हँसता ||
मानव तन अति दुर्लभ भाई ,इसको क्यों व्यर्थ गवाते हो |
नश्वर वस्तु के संग्रह में तू सत्य की बलि चढ़ाते हो ||
हीरा मोती सोना चांदी से मूल लक्ष्य नहीं पाओगे |
ये समय कीमती व्यर्थ गवा तू अंत समय पछताओगे ||


प. पूज्य पुनीताचरिजी महाराज

गिरनार

(यह भजन सत्संग सुवास से लिया गया हे)

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