ऋषि ज्ञान
ऋषि ज्ञान रुषति - गच्छति संसारपारम् इति। यह ऋषि कि व्यख्या हे . ऋषि कि आंखो के सामने सन्सार के पारलौकिक कल्याण का स्पष्ट दर्शन होता है.इंसान का सच्चा आप्तजन ऋषि ही हे . क्यूंकि वह राग द्वेष को वश हो कर कुछ भी अन्यथा नहीं बोलता और किसीको गलत सलाह नहीं देता

अंत समय क्या जाएगा संग में सोच विचार

अंत समय क्या जाएगा संग में सोच विचार


बहार रंग रंगाय के महल सजाया यार दिप जलाया सब तरफ तो भी लगे अंधियार | जन्म जन्म का कर्म ही अन्धकार समछाय, दिप जले अंदर नहीं होवे ना उजियार || माया वैभव से धीरे सोना मोती पाय, बिनु हरी हिरा के मिले दरिद्रता ना जाय | खुब फुलाया जगत में मानपान को पाय अंत समय क्या जाएगा संग में सोच विचार ||

दान किया नहीं यज्ञ किया , कुछ भी न किया अमान  
मान पान की चाह में , खोया सभी नादान  
तत्व प्रकृति गुण इन्द्रिय इससे तन निर्माण  
सुख दुःख अपने कर्म का भोगत जीव जहाँन  
हरी को निर्मलता जाचे , सरल स्वभाव सुहाय  
मूरख मन अज्ञान बस, बुद्धि रहा लगाय  
द्रव्य सजोये जात हो , जानो मरियो नाही  
कर्म भोग माथे पड़े रोय रोय पछताय  
व्याधि ग्रसे तन में जभी एक न बात सोहाय  
शिर धुनि धुनि पछतात हे मुख से न आवे राम  


प. पूज्य पुनीताचरिजी महाराज

गिरनार

(यह भजन सत्संग सुवास से लिया गया हे)

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